सारोद्धार
कृ ष्ण की वैदिक सभ्यता में, उपनयन -- पदवत्र उपवीत और ब्रह्म-गायत्री मन्त्य में िीक्षा -- दवशेष रूप से योग्य पुरुषो ों को प्रिान दकया जाता है; दजसमें से मदहलाओ ोंऔर शूद्ो ों को बाहर रखा जाता है। शुरुआती दिनो ों में, श्रील प्रभुपाि ने कु छ नाराज मदहला दशष्ो ों को, दजन्ोनों े दितीय िीक्षा नही ों दमलने पर दवद्ोह दकया था, उनको शाोंत करने के दलए, अपनी महला दशष्ओ ों को ब्रह्म-गायत्री िेने की प्रथा शुरु की थी लेदकन उन्ें पदवत्र उपवीत दिये दबना, दजसका अथथ था दक वे वास्तदवक ब्राह्मण नही ों थी । जैसे-जैसे समय बीतता गया और वररष्ठ भक्ो ों को कृ ष्ण की वैदिक सोंस्कृ दत के बारे में गहरा ज्ञान प्राप्त हुआ, उन्ें एहसास हुआ दक क्या हुआ था। कु छ लोग जो अब तक िीक्षा िेने वाले गुरु बन गए थे, वे कृ ष्ण के मूल दसद्धन्ो ों पर लौट आए और िूसरी िीक्षा के समय अपनी मदहला दशष्ो ों को ब्रह्म-गायत्री िेना बोंि कर दिया । वे पुरुष दशष्ो ों के साथ भी अदिक कठोर हो गए -- इसे के वल ब्राह्मण प्रवृदि वाले दशष्ो ों के दलए ही आरदक्षत कर दिया। इस बिलाव ने उन लोगो ों को चुनौदत िी जो इस्कॉन में स्त्यी-िीक्षा-गुरु और अन्म नारी-स्वतन्त्यवािी मामलो ों को आगे बढ़ाने में रत हैं । नतीजतन, जीबीसी ने इस मामले पर मागथिशथन के दलए शास्त्यीय सलाहकार सदमदत (SAC) से सोंपकथ दकया और SAC ने मदहलाओ ोंऔर अयोग्य पुरुषो ों को ब्रह्म-गायत्री प्रिान करने की मोंजूरी िेने के दलए अप्रदसद्धाोंदतक और िमथ दवरुद्ध तकथ प्रिान दकए। यह दनबोंि SAC के पेपर की प्रारम्भिक प्रदतदिया या जवाब के रूप में प्रकादशत है। यहााँ , हम इस बात पर प्रकाश डालते हैं दक SAC ने सोंशय समािान कर वास्तदवक अथथ को समझने की कृ ष्ण की मूल पद्धदत -- मीमाोंसा -- की उपेक्षा करते हुए सोंशय समािान की अपनी नयी मनगढ़ों त पद्धदत बनाई (जो पूवथ दनिाथररत पररणाम िेती है) । हम गुरु के कायों की व्याख्या करते समय उनके " मनोऽदभष्टम् " (मन की इच्चा) को समझने के महत्व पर जोर िेते हैं, दजसका मूल अोंततः शास्त्य में हैं । SAC हमारी िीक्षा प्रदिया को समझने में गलती करती है। चूाँदक ब्रह्म-गायत्री हमारे िीक्षा प्रोटोकॉल का दहस्सा है, इसदलए हमें पहले यह समझना होगा दक हमारी िीक्षा प्रणाली कै से काम करती है। इस प्रकार हम अपने सोंप्रिाय में िीक्षा के ढाोंचे का दवश्लेषण करते हैं -- दजसमें भागवत, पाोंचरादत्रक और वैदिक परों पराओों के तत्व शादमल हैं। दिर हम दिखाते हैं दक SAC ने उस मूलभूत प्रश्न को नजरअोंिाज कर दिया दजस पर सब कु छ दनभथर है -- "श्रील भम्भक्दसद्धाोंत सरस्वती ठाकु र ने उपनयन की शुरुआत क्यो ोंकी ?" और, दिखाते हैं दक इस प्रश्न का उिर दमलते ही SAC का पूरा तकथ ध्वस्त हो जाता है। हम जीबीसी के त्रुदटपूणथ प्रस्तावो ों पर भी चचाथ करते हैं जो उन्ोनों े SAC के समीक्षा रदहत पेपर पर आिाररत दकया था।